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RTI Act | क्या प्रथम अपील के अभिलेखों में उपलब्ध दस्तावेजों को द्वितीय अपील के समय अनिवार्य रूप से दाखिल किया जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

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सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। उक्त याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि क्या सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत प्रथम अपील के अभिलेखों में उपलब्ध दस्तावेजों को द्वितीय अपील के समय पुनः मंगाया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने यह आदेश पारित किया।

संक्षेप में कहें तो यह याचिका किशन चंद जैन नामक व्यक्ति ने दाखिल की, जिसमें RTI नियम, 2012 के नियम 8 और 9 के तहत केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील के साथ व्यापक दस्तावेज दाखिल करने की अनिवार्यता की आलोचना की गई। याचिकाकर्ता का दावा है कि ये प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं सूचना चाहने वालों, विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्ग के लिए अनावश्यक बाधाएं पैदा करती हैं। इसके परिणामस्वरूप अपील बिना किसी निर्णय के वापस कर दी जाती हैं।

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अपने मामले के समर्थन में उन्होंने बताया कि 2015 से 5 जून, 2024 के बीच सीआईसी द्वारा लगभग 1,09,286 अपीलें आवश्यक दस्तावेजों की कमी के कारण वापस कर दी गईं।

यह कहा गया कि RTI नियमों के नियम 9 के अनुसार, नियम 8 का पालन न करने पर सीआईसी द्वारा द्वितीय अपील वापस की जाती है। इस प्रकार, नियम RTI Act की धारा 19(3) के तहत सूचना चाहने वाले को दिए गए द्वितीय अपील के अधिकार को नकारते हैं।

आगे कहा गया,

“RTI नियमों के नियम 8 के तहत अपीलकर्ता द्वारा दाखिल किए जाने के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज पहले से ही CPIO और प्रथम अपीलीय प्राधिकरणों (FAA) द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। अपीलकर्ताओं को इन दस्तावेजों को फिर से जमा करने और दस्तावेजों को फिर से जमा न करने पर अपील वापस करने की आवश्यकता होने से अनावश्यकता होती है, और सूचना चाहने वालों के संवैधानिक अधिकार को कमजोर करता है।”

याचिकाकर्ता का तर्क है कि नियम 9 अनिवार्य नहीं है (क्योंकि इसमें कहा गया है कि अपील ‘वापस की जा सकती है’, न कि ‘वापस की जाएगी’) और नियम 8 का पालन न करने पर दूसरी अपील वापस करने की सीआईसी की प्रथा अन्यायपूर्ण, अनुचित और संदर्भगत रूप से अनुचित है।

याचिका में आगे कहा गया,

“चूंकि नियम 8 के तहत कई दस्तावेज दाखिल करने की आवश्यकता प्रक्रियात्मक मामला है, इसलिए इससे RTI Act की धारा 19(3) के तहत दिए गए मूल ‘अपील के अधिकार’ को पराजित/निराश नहीं किया जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य नागरिक के ‘सूचना के अधिकार’ को प्रभावी बनाना और लागू करना है।”

CIC के अलावा, याचिकाकर्ता का दावा है कि राज्य सूचना आयोग (SIC) भी संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, दस्तावेजों की कमी के कारण धारा 19(3) के तहत उनके समक्ष दायर दूसरी अपील वापस कर देते हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल की सरकारों द्वारा बनाए गए निम्नलिखित नियमों का हवाला दिया:

• पश्चिम बंगाल सूचना का अधिकार नियम, 2006 के नियम 5 और 6।

• हरियाणा सूचना का अधिकार नियम, 2009 के नियम 6।

• उत्तर प्रदेश सूचना का अधिकार नियम, 2015 के नियम 7(2)।

याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतें इस प्रकार हैं:

(i) RTI नियमों के नियम 9 को गैर-अनिवार्य माना जाए और नियम 8 का अनुपालन न करने पर दूसरी अपील वापस करने की प्रथा बंद की जाए।

(ii) बिना दस्तावेजों के ऑनलाइन फाइलिंग की जन-अनुकूल प्रणाली (पहली अपील पर लागू) को दूसरी अपील के लिए लागू किया जाए।

(iii) वैकल्पिक रूप से RTI नियमों के नियम 8 और 9, तथा राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए समान नियमों को RTI Act की धारा 3, 19(3), 19(5) और 27(1) का उल्लंघन करने के कारण मनमाना, असंवैधानिक और अवैध घोषित किया जाए।

(iv) संघ/राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाए कि वे PIO और FAA के अभिलेखों को CIC और SIC के अभिलेखों के साथ एकीकृत और अंतःस्थापित करें, जिससे निर्बाध सूचना साझा की जा सके, जिससे अपीलकर्ताओं को दूसरी अपील दायर करते समय दस्तावेज पुनः प्रस्तुत करने की आवश्यकता समाप्त हो जाए।

केस टाइटल: किशन चंद जैन बनाम केंद्रीय सूचना आयोग और अन्य, डब्ल्यू.पी.(सी) संख्या 402/2024

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