कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुधवार को जनहित याचिका खारिज की। उक्त याचिका में यह घोषित करने की मांग की गई कि कर्नाटक राज्य में मंदिर सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) की धारा 2 (एच) के अर्थ में सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं हैं।
याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी नंबर 2 (हिंदू धार्मिक एवं बंदोबस्ती विभाग के आयुक्त) को 16-06-2007 की अपनी अधिसूचना, साथ ही 03/02/2017 की सहायक अधिसूचना और संबंधित संशोधनों को वापस लेने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि कुछ लोग जो खुद को व्हिसल-ब्लोअर कहते हैं, मंदिरों के अर्चकों और कर्मचारियों को परेशान करते हैंष यह अधिसूचना जिसके तहत मंदिरों में पीआईओ की नियुक्ति की जाती है, उन्हें उन्हें और अधिक परेशान करने के लिए उपकरण और लाभ प्रदान करेगी। सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाईकोर्ट के निर्णयों पर भरोसा किया गया।
डपीठ ने कहा,
इसमें यह भी कहा गया,
”न केवल यह विषयवस्तु जनहित याचिका नहीं बन सकती, बल्कि यह आधार भी अस्पष्ट है कि तथाकथित शिकायतकर्ता पुजारियों को परेशान करते हैं। इसलिए अधिसूचनाओं के खिलाफ याचिकाकर्ता का मामला स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
इसके अलावा, इसने कहा कि अर्चकों और पुजारियों की शिकायत गलत है, जब उन्हें आशंका है कि शिकायतकर्ता उन्हें परेशान करेंगे।
हालांकि, इसने स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से व्यक्तिगत निकायों के लिए उचित याचिका में अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने के दरवाजे बंद नहीं होंगे, जिससे यह तर्क दिया जा सके कि मंदिर RTI Act के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण के दायरे में नहीं आते।
केस टाइटल: मेसर्स अखिला कर्नाटक हिंदू मंदिर पुजारी आगमिक और अर्चक संघ और कर्नाटक राज्य और अन्य