बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी महिला को यह कहना कि यदि वह अपने पति या ससुराल वालों द्वारा मांगे गए पैसे अपने माता-पिता के घर से लाने में विफल रहती है तो उसे अपने पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी, मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न नहीं माना जाएगा। जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और रोहित जोशी की खंडपीठ ने कहा कि पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज कराई गई अपनी FIR में कहा था कि उन्होंने उससे अपने माता-पिता के घर से 5 लाख रुपये लाने को कहा, जिससे पति सार्वजनिक सेवा में स्थायी नौकरी पाने के लिए उतना पैसा दे सके। हालांकि उसने कहा कि उसके माता-पिता गरीब हैं। इसलिए वे उक्त राशि का भुगतान करने की स्थिति में नहीं होंगे।
जजों ने 10 जनवरी को सुनाए गए अपने आदेश में कहा, “इसके बाद पति और ससुराल वालों ने कहा कि अगर वह रकम लाने में असमर्थ है तो उसे सहवास के लिए नहीं आना चाहिए। इस आधार पर उसे बार-बार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। फिर से शारीरिक और मानसिक क्रूरता के बराबर कृत्य नहीं किए गए। यह कथन कि जब तक वह रकम नहीं लाती उसे बिना किसी कार्रवाई के सहवास के लिए नहीं आना चाहिए, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के बराबर नहीं होगा।
खंडपीठ ने बताया कि इस मामले में पत्नी रिकॉर्ड पर सही तारीखें लाने में विफल रही कि ऐसी मांगें कब की गईं और ऐसी मांगें कितने समय तक बनी रहीं। न्यायाधीशों ने कहा कि पत्नी ने केवल अस्पष्ट आरोप लगाए हैं क्योंकि उसने यह नहीं बताया कि उसके साथ किस तरह से क्रूरता या दुर्व्यवहार किया गया। इसके अलावा जजों ने पुलिस द्वारा ऐसे मामलों की जांच करने के तरीके पर अपनी चिंता व्यक्त की। जजों ने कहा कि पुलिस द्वारा दर्ज किए गए अधिकांश बयान शिकायतकर्ता महिला के रिश्तेदारों के थे और वे केवल कॉपी पेस्ट थे और कुछ नहीं।
जजों ने कहा, “हम यह देखने के लिए बाध्य हैं कि पुलिस अधिकारी ऐसे मामलों की जांच उस तरीके से नहीं कर रहे हैं, जिस तरीके से उन्हें करना चाहिए। कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती, न ही उचित प्रक्रिया अपनाई जाती है। कॉपी-पेस्ट की प्रकृति के बयान जांच अधिकारी द्वारा दिमाग का इस्तेमाल न करने और असंवेदनशीलता का उदाहरण हैं।” खंडपीठ ने कहा कि पुलिस वैवाहिक घर के पड़ोसियों से पूछताछ नहीं करती है। केवल उन गवाहों के बयान दर्ज करती है, जो या तो पत्नी के रिश्तेदार हैं या उसके माता-पिता के पड़ोसी हैं।
खंडपीठ ने कहा, “बेशक महिला अपने साथ हुए व्यवहार के बारे में सबसे पहले अपने माता-पिता और रिश्तेदारों को बताएगी और फिर उनके बयान महत्वपूर्ण होंगे। हालांकि इसमें शामिल अन्य संभावनाएं और उपलब्ध होने पर कोई अन्य सबूत जांच अधिकारियों द्वारा बिल्कुल भी विचार नहीं किया जाता है।” इसके अलावा जजों ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि पुलिस उन सभी लोगों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल करे जिनका नाम FIR में है। साथ ही गवाहों के बयान भी दर्ज करें। खंडपीठ ने टिप्पणी की, “यदि वे आरोपी दूर के स्थान पर रहते हैं तो वे किस तरह से अपराध में शामिल रहे होंगे, इस पर जांच अधिकारी को विचार करना चाहिए। जांच अधिकारी के लिए यह समझदारी की बात है कि वे केवल उन्हीं आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल करें, जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत हैं। अनावश्यक उत्पीड़न और झूठे आरोप से बचना चाहिए।” ये टिप्पणियां तब की गईं, जब खंडपीठ ने पाया कि इस मामले में FIR में जिन लोगों के नाम दर्ज, उनमें पति, उसके माता-पिता, उसका भाई, उसकी विवाहित बहन और उसका पति तथा पति का एक चचेरा भाई शामिल है। इसलिए पीठ ने FIR खारिज की। केस टाइटल: एमएम बनाम महाराष्ट्र राज्य (आपराधिक आवेदन 3263/2023)