अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर सुनवाई करेगा कि क्या सभी राजनीतिक दलों को RTI Act, 2005 के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ माना जा सकता है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) संजीव खन्ना और जस्टिस जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ सभी राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत “सार्वजनिक प्राधिकरण” के रूप में लाने के निर्देश देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। ADR की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने जोर देकर कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में 10 साल से लंबित है। सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन भी अदालत के समक्ष पेश हुए।
भूषण ने कहा कि वर्तमान मुद्दा ऐतिहासिक चुनावी बांड मामले में निहित है, जहां संविधान खंडपीठ ने माना कि गुमनाम चुनावी बांड संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। कहा गया, “यह एक तरह से चुनावी बॉन्ड मामले में माननीय जज के फैसले से जुड़ा हुआ है, जहां माननीय जज ने कहा कि यह बिल्कुल जरूरी है कि मतदाताओं को पार्टियों के फंडिंग के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार हो।
सीजेआई ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि मामले की मेरिट के आधार पर सुनवाई करना जरूरी है। खंडपीठ ने निर्देश दिया कि मामलों को 21 अप्रैल, 2025 से शुरू होने वाले सप्ताह में नियमित बोर्ड में सूचीबद्ध किया जाए। भूषण ने इस बात पर प्रकाश डाला कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने अपने 2013 के फैसले में कहा था कि राजनीतिक दल RTI Act के तहत आ सकते हैं। CIC ने 3 जून, 2013 के अपने आदेश में 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों अर्थात् कांग्रेस, भाजपा, सीपीआई (एम), सीपीआईओ, एनसीपी और ईएसपी को आरटीआई अधिनियम की धारा 2 (एच) के तहत “सार्वजनिक प्राधिकरण” घोषित किया था। केस टाइटल: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया कैबिनेट सेक्रेटरी | डायरी नंबर – 16902/2015 और संबंधित मामला